28 Apr

अक्षय तृतीया आखातीज के नाम से भी जाना जाता है | आखातीज का व्रत वैशाख  माह में सुदी तीज को किया जाता है |

इस दिन श्री लक्ष्मी जी सहित भगवान नारायण की पूजा की जाती है | पहले भगवान नारायण और लक्ष्मी जी की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराना चाहिए | उन्हें पुष्प - माल्यार्पण करना चाहिए | भगवान को धूप , दीप से आरती उतारकर चंदन लगाना चाहिए | मिश्री और भीगे हुए चनों का भोग लगाना चाहिए | भगवान को तुलसी - दल और नैवेध अर्पित कर ब्राह्राणों को भोजन कराकर श्रद्धानुसार दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए | इस दिन सभी को भगवत् -  भजन करते हुए  सद्चिंतन करना चाहिए | अक्षय तृतीया के दिन किया कोई भी कार्य बेकार नहीं जाता इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है |  अक्षय तृतीया का व्रत भगवान लक्ष्मीनारायण को प्रसन्नता प्रदान करता है | वृंन्दावन में केवल आज के दिन बिहारीजी के पाँव के दर्शन होते हैं | किसी भी शुभ कार्य को करने  के लिये यह दिन बहुत ही शुभ माना जाता है | इस दिन प्रातः काल में मूंग और चावल की खिचड़ी बिना नमक डाले बनाए जाने को बड़ा ही शुभ माना जाता है | इस दिन पापड़ नहीं सेंका जाता और न ही पक्की रसोई बनाई जाती है |  इस दिन  नया घड़ा , पंखा , चावल , चीनी , घी , नमक , दाल , इमली , रूपया , इत्यादि को श्रद्धापूर्वक ब्राह्राण को दान देते हैं |

अक्षय तृतीया या आखातीज व्रत की कथा

अत्यन्त प्राचीन काल की बात है | महोदय नामक एक वैश्य कुशावती नगरी में निवास करता था | सौभग्यवश महोदय वैश्य को एक पंडित द्धारा अक्षय तृतीया के व्रत का विवरण प्राप्त हुआ | उसने भक्ति - भाव से विधि व नियमपूर्वक व्रत रखा | व्रत के प्रभाव से वैश्य कुशावती नगरी का महाप्रतापी और शक्तिशाली राजा बन गया | उसका कोष हमेशा स्वर्ण - मुद्राओं , हीरे - जवाहरातों से भरा रहता था | राजा स्वभाव  दानी भी था | वह उदार मन होकर बिना सोचे समझे दोनों हाथों से दान देता था |  एक बार राजा के वैभव और सुख - शान्तिपूर्वक जीवन से आकर्षित होकर कुछ जिज्ञासु लोगों ने राजा से उसकी समृद्धि और प्रसिद्धि का कारण पूछा | राजा ने स्पष्ट रूप से अपने अक्षय तृतीया व्रत की कथा को सुनाया और इस व्रत की कृपा के बारे में बताया | राजा ने यह सुनकर उन जिज्ञासु पुरुषों और राजा की प्रजा ने नियम और विधान सहित अक्षय तृतीया व्रत रखना प्रारम्भ कर दिया | अक्षय तृतीया व्रत के पुण्य प्रभाव से सभी नगर - निवासी , धन - धान्य से पूर्ण होकर वैभवशाली और सुखी हो गये | हे ! अक्षय तीज माता जैसे आपने उस वैश्य वैभव - सुख और राज्य प्रदान किया वैसे ही अपने भक्तों एवं श्रदालुओं को धन - धान्य और सुख देना | सब पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखना | हमारी आप से यही विनती है |