29 Nov

धार्मिक कर्मकांडो में पुष्प का महत्व क्यों ?

पुष्प के सबंधं में कहा गया -

पुण्य संवर्धनाच्चापि  पापौघपरिहारतः

पुष्पकलार्थप्रदानार्थ पुष्पमित्यभिधीयते                            कुलार्णवतंत्र

अर्थात् पुण्य को बढ़ाने , पापों को भगाने और श्रेष्ठ फल को प्रदान करने के कारण ही यह पुष्प कहा जाता है ।

दैवस्य मस्तंक  कुर्यात्कुसुमोपहितं   सदा ।                                                                             शारदा तिलक

अर्थात् देवता का मस्तक सदैव पुष्प से सुशोभित रहना चाहिए ।

पुष्पैर्दवां प्रसीदन्ति पुष्पैः देवाश्च संस्थिताः

न रत्नैर्न सुवर्णेन न वित्तेन च भूरिणा

तथा प्रसादमायाति यथा पुष्पैर्जनार्दन । 

अर्थात् देवता लोग रत्न सुवर्ण , भूरि द्रव्य , व्रत तपस्या एवं अन्य किसी भी साधनों से उतना प्रसन्न नहीं होते , जितना कि पुष्प चढ़ाने से होते हैं । भारतीय संस्कृति में पुष्प का उच्च स्थान है । देवी देवताओं और भगवान् पर आरती , व्रत , उपवास , या पर्वो पर पुष्प चढ़ाए जाते हैं । धार्मिक  अनुष्ठान , संस्कार , सामाजिक व पारिवारिक कार्यो को बिना पुष्प के अधूरा समझा जाता है । पुष्पों की सुगंध से देवता प्रसन्न होते हैं । सुंदरता के प्रतीक पुष्प हमारे जीवन में उल्लास , उमंग  और प्रसन्नता के प्रतीक हैं ।