07 Mar

सुंदर कांड वास्तव में हनुमानजी का कांड है । हनुमानजी का एक नाम सुंदर भी है । सुंदर कांड के लिए कहा गया है ।

सुंदरे सुंदरे रामः सुंदरे सुंदरीकथा

 सुंदरे सुंदरे सीता सुंदरे किम् सुंदरम् ||

सुंदर कांड में मुख्य मूर्ति श्री हनुमानजी की ही रखी जानी चाहिए । इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि हनुमानजी सेवक रूप से भक्ति के प्रतीक हैं अंतः उनकी अर्चना करने से पहले भगवान राम का स्मरण और पूजन करने से शीघ्र फल मिलता है । कोई व्यक्ति खो गया हो अथवा पति पत्नी , साझेदारों के सबंधं बिगड़ गए हों और उनको सुधारने की आवश्यकता अनुभव हो रही हो तो सुंदर कांड शीघ्र फल देने वाला होता है ।

सुंदरकांड के अंतिम दोहे में कहा गया है ।

सकल सुमंगलदायक , रघुनायक गुन गान

सादर सुनहिं ते तरहिं , भवसिंधु बिना जलजान

अर्थात् श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलो का यानी सभी लौकिक एवं परलौकिक मंगलो को देने वाला है , जो इसे आदरसहित सुनेंगे , वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर को तर जाएंगे ।

सुंदरकांड में तीन श्लोक , साठ दोहे तथा पांच सौ छब्बीस चौपाइयां हैं । साठ दोहें में से प्रथम तीस दोहों में विष्णुस्वरूप श्री राम के गुणों का वर्णन है । ' सुंदर ' शब्द इस कांड में चौबीस चौपाइयों में आया है ।सुंदरकांड के नायक रुद्रावतार श्रीहनुमान् हैं । अशांत मन वालों को शांति मिलने की अनेक कथाएं इसमें वर्णित हैं ।

इसमें रामदूत श्रीहनुमान् के बल , बुद्धि और विवेक का बड़ा ही सुंदर वर्णन है । एक ओर श्रीराम की कृपा पाकर हनुमान् जी अथाहसागर को एक ही छलांग में पार करके लंका पहुंच जाते हैं , तो दूसरी ओर बड़ी कुशलता से लंकिनी पर प्रहार करके लंका में प्रवेश भी पा लेते हैं । बालब्रहाचारी हनुमान् ने विरह - विदग्ध मां सीता को श्रीराम के विरह का वर्णन इतने भावपूर्ण शब्दों में सुनाया है कि स्वयं सीता अपने विरह को भूलकर राम की विरह वेदना में डूब जाती है । इसी कांड में विभीषण को भेदनीति , रावण को भेद और दंडनीति तथा भगवत्कृपा प्राप्ति का मंत्र भी हनुमान् जी ने दिया । अंततः पवनसुत ने सीताजी का आशीर्वाद तो प्राप्त किया ही है ,  रामकाज को पूरा करके प्रभु श्रीराम को भी विरह से मुक्त किया है और उन्हें यद्ध के लिए भी प्रेरित भी किया है । इस प्रकार सुंदरकांड नाम के साथ साथ इसकी कथा भी अति सुंदर है । आध्यात्मिक अर्थो में इस कांड की कथा के बड़े गंभीर और साधनामार्ग के उत्कृष्ट निर्देशन हैं अंतः सुंदरकांड आधिभौतिक , आध्यात्मिक एवं आधिदैविक  सभी दृष्टियों से बड़ा ही मनोहरी कांड है ।

सुंदरकांड के पाठ अमोघ अनुष्ठान माना जाता है ऐसा विश्वास किया जाता है की सुंदरकांड का पाठ करने से दरिद्रता एवं दुखों का दहन , अमंगलों संकटों का निवारण तथा गृहस्थजीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है । पूर्णलाभ प्राप्त करने के लिए भगवान् मे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना जरुरी है ।