04 Mar

शनिदेव दक्ष प्रजापति की पुत्री संज्ञादेवी और सूर्यदेव के पुत्र हैं । यह नवग्रहों में सबसे भयभीत करने वाला ग्रह है । इसका प्रभाव एक राशि पर ढाई वर्ष और साढे साती के रूप में लंबी अवधि तक भोगना पड़ता है । शनिदेव की गति अन्य सभी ग्रहो से मंद होने के कारण इनका लंगड़ाकर चलना है । वे लंगड़ाकर क्यों चलते हैं , इसके सबंधं में सूर्यतंत्र में एक कथा है - एक बार सूर्यदेव का तेज सहन न कर पाने की वजह से संज्ञादेवी ने अपने शरीर से अपनी जैसी ही एक प्रतिमूर्ति तैयार की और उसका नाम स्वर्णा रखा । उसे आज्ञा दी कि तुम मेरी अनुपस्थिति में सारी संतानों की देखरेख करते हुए सूर्यदेव की सेवा करो और पत्नी सुख भोगो । आदेश देकर वह अपने पिता के घर चली गई । स्वर्णा ने भी अपने आपको इस तरह ढाला कि सूर्यदेव भी यह रहस्य न जान सकें । इस बीच सूर्यदेव से स्वर्णा को पांच पुत्र और दो पुत्रियां हुई । स्वर्णा अपने बच्चो पर अधिक और संज्ञा की संतानो पर कम ध्यान देने लगी ।

एक दिन संज्ञा के पुत्र शनि को तेज भूख लगी , तो उसने स्वर्णा से भोजन मांगा । तब स्वर्णा ने कहा कि रोको , पहले मैं भगवान् का भोग लगा लूं और तुम्हारे छोटे भाई बहनों को खिला दूं , फिर तुम्हें  भोजन दूंगी । यह सुनकर शनि को क्रोध आ गया और उन्होंने माता को मारने के लिए अपना पैर  उठाया , तो स्वर्णा ने शनि को शाप दिया कि तेरा पांव अभी टूट जाए । माता का शाप सुनकर शनिदेव डरकर अपने पिता के पास गए और सारा किस्सा कह सुनाया । सूर्यदेव तुरंत समझ गए कि कोई भी माता अपने पुत्र को इस तरह शाप नही दे सकती । इसलिए उनके साथ उनकी पत्नी नई , कोई अन्य है ।

सूर्यदेव ने क्रोध में आकर पूछा कि बताओ तुम कौन हो ? सूर्य का तेज देखकर स्वर्णा घबरा गई और सच्चाई उन्हें बता दी । तब सूर्यदेव ने शनि को समझाया कि स्वर्णा  तुम्हारी माता नहीं है , लेकिन मां समान है । इसलिए उनका दिया शाप व्यर्थ तो नही होगा , परंतु यह इतना कठोर नहीं होगा कि टांग पूरी तरह से अलग हो जाए । हां , तुम आजीवन एक पांव से लंगड़ाकर चलते रहोगे । तभी से शनिदेव लंगड़े हैं ।

शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाया जाता है , इस सबंधं में आनंदरामायण में एक कथा का उल्लेख़ मिलता है । जब भगवान् राम कि सेना ने सागरसेतु बांध लिया , तब  राक्षस इसे हानि न पहुंचा सकें । उसके लिए पवनसुत हनुमान को उसकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई । जब हनुमान जी शाम के समय अपने इष्टदेवता राम के ध्यान में मग्न थे , तभी सूर्यपुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोधपूर्वक कहा - ' हे वानर ! मैं देवताओं में शक्तिशाली  शनि हूं । सुना है , तुम बहुत बलशाली हो । आंखें खोलो और मुझसे युद्ध करो , मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूं । ' इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा - ' इस समय मै अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूं । आप मेरी पूजा में विघ्न मत डालिए । आप मेरे आदरणीय है , कृपा करके यहां से चलिए जाइए । ' जब शनि लड़ने पर ही उतर आए तो हनुमान ने शनि को अपनी पूंछ में लपेटना शुरू कर दिया । फिर उसे कसना प्रारंभ कर दिया । जोर लगाने पर भी शनि उस बंधन से मुक्त न होकर पीड़ा से व्याकुल होने लगे । हनुमान जी ने फिर सेतु की परिक्रमा शुरू कर शनि के घमंड को तोड़ने के लिए पत्थरों पर पूंछ को झटका दे दे कर पटकना शुरू कर दिया ।  इससे का शनि का शरीर लहुलुहान हो गया , जिससे  उनकी पीड़ा बढ़ती गई । तब शनिदेव ने हनुमान जी प्रार्थना की कि मुझे बंधनमुक्त कर दीजिए । मैं अपने अपराध की सजा पा चुका हूं । फिर मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी ।

इस पर हनुमानजी बोले - मैं तुम्हें तभी छोडूंगा , जब तुम मुझे वचन दोगे कि श्रीराम के भक्तों को कभी परेशान नहीं करोगे । यदि तुमने ऐसा किया , तो मैं तुम्हें कठोर दंड दूंगा ' । शनि ने गिड़गिड़ाकर कहा - 'मैं तुम्हे वचन देता हूं कि कभी भूलकर भी आपके और श्रीराम के भक्तों की राशि पर नहीं आऊंगा । आप मुझे छोड़ दें '। तब हनुमान् ने शनिदेव को छोड़ दिया । फिर हनुमान जी से शनिदेव ने अपने घावों की पीड़ा मिटाने के लिए तेल मांगा । हनुमान् ने जो तेल दिया , उसे घाव पर लगाते ही शनिदेव  पीड़ा मिट गई । उसी दिन से शनिदेव को तेल चढ़ता है , जिससे उनकी पीड़ा शांत हो जाती है और वे प्रसन्न हो जाते हैं ।