18 Dec

धर्म की हमारे जीवन में क्या महत्ता है ? धर्म हमें एक अच्छा मनुष्य बनाता है । हम अच्छे जीवन के सभी मूल्यों का पालन करें इसके लिए यह आवश्यक है कि हम ईश्वर और धर्म में अटूट आस्था रखें । सभी धर्मो के रीति - रिवाज व पद्धतियां हमें यही सिखाती हैं कि हम जीवन में सच्चाई के मार्ग पर चलें , स्वयं भले रहें और दूसरों की भी भलाई करें । धर्म इंसान के लिए एक मार्गदर्शक होता है जो उसे सही और गलत में अंतर करना सिखाता है ।

कई अर्थो में धर्म एक दूसरे से काफी भिन्न होते हैं , परन्तु इसका अर्थ यह नहीं की उनमें समानताएं नहीं होतीं । सबसे बड़ी समानता तो यही है कि सभी धर्म हमें भक्ति और मानवता का मार्ग दिखाते हैं । सभी धर्मो की कुछ मान्यताएं होती हैं जो सदियों से चली आ रही हैं और जिनके विषय में ऐसा माना जाता है कि वे स्वयं ईश्वर की ओर से व्यक्ति के लिए कही गई हैं ।

इसके अतिरिक्त सभी धर्म एक भगवान मानते हैं , अपितु अनेक धर्म होते हुए भी भगवान एक होता है। जब तक सृष्टि है , जमीन पर आसमान चांद सितारे हैं , जीवन है तब तक ' क्यों ' का अस्तित्व खत्म नहीं होगा । आपके जीवन में कभी न कभी कोई न कोई क्रिया कलाप चलता ही रहता है । जिसमें अनेकों कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें हम अपने पूर्वजों के सिखाए अनुसार करते हैं , किंतु क्यों करते हैं ?

भारत में हिंदू धर्म की मान्यताएं है । उन्हें ऋषि मुनियों और विद्धानों ने यूं ही नहीँ बना दिया है । उन मान्यताओं के पीछे कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा है । पूजा पाठ , यज्ञ , हवन , देवी देवताओं का पूजन सिमरन आदि क्या केवल मान्यताओं के अनुसार ही किया जाता है । सम्भवतः नहीं । इनके पीछे अवश्य ही कोई बड़ा रहस्य है ।

 सभी धर्मो में संस्कार व् परम्पराओं का विशेष महत्व है । इसकी महत्ता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है की मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों व रीति रिवाजों में ही उलझा रहता है ।

जिस प्रकार सभी धर्मो में ईश्वर की कल्पना की गई है । उसी प्रकार संस्कारों का भी अपना महत्व है । अच्छे संस्कारों से ही मनुष्य महान बनता है । यह बात अलग है आपा धापी के जीवन ने हमारे संस्कारों को बेतरह प्रभावित किया है । प्रभवित ही नहीं अपितु अब लोगों में संस्कारों के प्रति दृष्टिकोण भी बदल रहा है। लेकिन संस्कारों के आभाव में किसी भी धर्म की कल्पना करना निरर्थक है । व्यक्ति को ईश्वर की  उपस्थिति  का अनुभव करते हुए स्वयं क्या है यह जानने का प्रयास करना चाहिए । इसके साथ साथ आवश्यक है यह ध्यान देना कि वर्तमान जीवन का स्तर क्या है और हमारा सामाजिक स्तर हमारे बौद्धिक स्तर के समरूप है अथवा नहीं , क्योंकि उत्थान और पतन इस पर निर्भर करता है ।

अंत में मुझे इतना ही लिखना है कि जब तक क्यों है तब तक जिज्ञासा है , आशा है । जिज्ञासा समाप्त , आशा मिट गई तो जीवन का भी क्या मूल्य ? जो मूल्यविहीन है वह मिटटी है ।