20 Jul

कांवड़ चढ़ाने के विषय पर पौराणिक कथा इस प्रकार है

जब समुंद्र मंथन हो रहा था उस समय सबसे पहले समुंद्र से विष उत्पन्न हुआ और उस विष की भयंकर गर्मी से देवतागण , दैत्य और सारा संसार व्याकुल हो गया , तब विष्णु भगवान की प्रेरणा से शिव ने आगे आकर सभी के कल्याण हेतु विष का पान कर लिया | लेकिन उन्होंने उस विष को कण्ठ तक ही सीमित रखा , जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया और वे नीलकण्ठ कहलाये |

भगवान शिव पर विष की गर्मी का इतना ज्यादा असर होने लगा कि वे तीनों लोकों में घूमने लगे और राम नाम के स्थान पर उनके मुख में बम बम निकलने लगा तब देवताओं ने विष की गर्मी को शांत करने के लिये शिवजी के मस्तक पर बहुत सा जल चढ़ाया और कालान्तर में गंगा जी की स्थापना भगवान शिव के मस्तक पर की गई |उसी समय से शिव जी पर जल चढ़ाने की परम्परा चली आ रही है |  जो आज तक मान्य है | पुराणों में यह वर्णन किया गया है कि रावण ने भी हरिद्धार से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था |

 

कांवड़ महिमा

भगवान शिव , पद यात्रा  द्धारा  कांवड़ में लाये गंगाजल से अति प्रसन्न होते है | कलियुग में जहाँ  लाखों लोग 1 किलोमीटर भी दैनिक दिनचर्या में पैदल नहीं चलते | वे सब सावन व फाल्गुन के महीने में भगवान  शिव के आशीर्वाद से 100 किलोमीटर से 600 किलोमीटर तक का कठिन रास्ता पैदल चलकर आते हैं | और भगवान भोलेनाथ पर गंगाजल से अभिषेक करते हैं | और पूरे रास्ते बम - बोल बम का उच्चारण करते चलते हैं | व ''ॐ नमः शिवाय '' का जाप करते हैं |

 भोलेबाबा अपने भक्तों की सभी मनोकामना शीघ्रता से पूरी करते हैं | भक्तों की श्रद्धा और निष्ठा भाव देखने लायक होता है | जब उनके पैरों में छाले होते है | और वो ''ॐ नमः शिवाय '' का जाप करते हुए अपनी मंजिल पर पहुंच जाते हैं | तेज धूप , आंधी और मूसलाधार वर्षा में भी नई रुकते और  ''ॐ नमः शिवाय '' का जाप करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं | जब सभी भक्तजन भोलेबाबा के भवन में पहुंचकर गंगाजल से उनका अभिषेक करते हैं , तो उनकी सब पीड़ा और थकान दूर हो जाती है और वह ख़ुशी से झूम उठते हैं |