07 Oct

कार्तिक मास की गणेशजी की कथा

एक समय कि बात है  अगस्त्य मुनि समुद्र तट के किनारे बैठकर कठोर तपस्या कर रहे थे । जहां वह बैठे थे वहां से थोड़ी ही दूरी पर एक पक्षी अपने अंडों पर बैठा उन्हें सेकं रहा था । अचानक समुद्र में तूफान आया और जल का बहाव इतना तेज था कि उस पक्षी के अण्डे उसमे बह गये । उस पक्षी को बहुत दुख हुआ । उसने प्रण लिया कि मै समुद्र के जल को समाप्त कर दूंगा । पक्षी अपनी चोंच से समुद्र का जल भर - भरकर बाहर फेंकने लगा । पर समुद्र तो इतना विशाल था कि कुछ असर ही नहीँ हो रहा था । चोंच से उसे कैसे सुखाया जा सकता था ! फलतः काफी समय बीत जाने पर भी समुद्र का जल सूखना तो क्या , थोड़ा भी नहीँ घटा । दुखी होकर पक्षी मुनि अगत्स्य के पास गया और अपनी सारी दुख भरी व्यथा कह सुनाई । मुनि ने गणेशजी का ध्यान एवं उनकी आराधना कर गणेश चतुर्थी का व्रत किया गणेशजी की ऐसी कृपा हुई की मुनि अगत्स्य के अन्दर समुद्र का जल पीने की अक्षम्य श्रमता आ गई और उन्होंने समुद्र का सारा जल सोख लिया । इससे उस पक्षी के अण्डे बच गये ।