05 Oct

पितृ विसर्जन अमावस्या

इस दिन शाम को दीपक जलाने के बाद पूड़ी - पकवान आदि खाद्य पदार्थ दरवाजे पर रखे जाते हैं | जिसका अर्थ यह है कि पितर जाते समय भूखे न रह जायें | इसी तरह दीपक जलाने का आशय उनके मार्ग को प्रकाशमय करने का है | अश्विन अमावस्या पितृ - विसर्जन अमावस्या के नाम से जानी जाती है | इस दिन ब्राह्मण भोजन तथा दानादि से पितर तृप्त हो जाते है | ऐसी मान्यता है कि  विसर्जन के समय वे अपने पुत्रो को आशीर्वाद देकर जाते है इस दिन सवा किलो जौ के आटे के सोलह पिण्ड बनाकर , आठ गाय को , चार कुत्ते को एवं कौओं को खिलाना चाहिए एवं उस दिन पितृ स्त्रोत का पाठ करना चाहिए |

पितृस्त्रोत

जो सबके द्वारा पूजनीय , अमूर्त , अत्यंत तेजस्वी , ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि से सम्पन्न है , मैं उन पितरो को सदा नमस्कार करता हूँ | जो इंद्र आदि देवताओं , दक्ष , मारीचादि सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं , कामनाओं की पूर्ति करने वाले पितरों को मै प्रणाम करता हूँ | जो मनु आदि राजर्षियों , मुनिश्वरों तथा सूर्य और चंद्रमा के भी नायक हैं | नक्षत्रों , ग्रहों , वायु , अग्नि , आकाश और भलोक तथा पृथ्वी के जो भी नेता हैं , उन पितरो को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ | जो देवर्षियों के जन्मदाता , समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं , उन पितरो को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ |

प्रजापति , कश्यप , सोम , वरुण तथ योगेश्वरों के रूप में स्थित सात पितृगणों को कोटि कोटि - प्रणाम | मैं योगदृष्टि सम्पन्न स्वयंभू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ | चंद्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी  पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ | साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ तथा अग्निस्वरूप अन्य पितरों को भी प्रणाम करता हूँ क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय हैं जो पितर में स्थित जो ये चंद्रमा , सूर्य और अग्नि के रूप में विधमान हैं | तथा जो जगत् स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं , उन सम्पूर्ण योगी पितरों को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ | मैं उन्हें बार बार शत् शत् प्रणाम करता हूँ | वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हों |