13 Oct

रामायण - पाठ संक्षेप में

बालकाण्ड

मंगल भवन अमंगल हारी , द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी |

जो अनाथ हित हम पर नेहू , तो प्रसन्न होइ यह वर देहू |

देखहिं हम सो रूप भरि लोचन , कृपा करहुं प्रनतारित मोचन |

बार बार  मांगऊँ कर जोरें , मन परिहैर चरन जनि भोरें |

अयोध्या काण्ड

सेवक हर स्वामी सिय नाहू , होउ नाथ यह ओर निबाहु |

अब करि कृपा देहु वर एहूं , निज पद सरसिज सहज सनेहूं |

जोरि पानि वर मांगऊँ एहूं , सिया राम पद सहज सनेहूं |

सीता राम चरन रति मोरे , अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरे |

अरण्य काण्ड

जो कोसलपति राजिवच नयना , करउ सो राम हृदय मम अयना |

अस अभिमान जाइ जनि भोरे , मैं सेवक रघुपति पति मोरे |

यह वर मांगऊँ निकेता , बसहु हृदय श्री अनुज समेता |

किष्किन्धा काण्ड

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरे , सेवक प्रभुहि परै जनि भोरे |

सेवक सुत पति मातु भरोसे , रहे असोच बनै प्रभु पोसे |

अब प्रभु कृपा करहु एहि भांति , सब तजि भजनु करौ दिन राति |

सुन्दर काण्ड

दीन दयाल विरदु संभारी , हरहु नाथ मम शंकर भारी |

अब में कुशल मिटे भय , देखि राम पद कमल तुम्हारे | 

तुम्ह कृपाल जापर अनुकूला , ताहि न व्याप विविध भवसूला |

लंका काण्ड

कृपा वारिधर राम खरारी , पाहि पाहि प्रनतारित हारी |

अनुज जानकी सहित निरन्तर , बसहु राम नृप मम उर अन्तर |

उत्तर काण्ड

जो करनी समझै प्रभु मोरी , नहिं निस्तार कल्प सत करेगी |

असरन सरन विरदु संभारी , मोहि जनि तजहु भगत हितकारी |

मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता , जाऊँ कहां तजि पद जलजता |

देहु भगति रघुपति अतिपावनी , विविध ताप भवताप नसावनी |

रामचरण वारिज जब देखैं , तब निज जन्म सफल करि देखौं |