27 Oct

पीपल का पूजन क्यों ?

गीता में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं

अश्वत्थः ' सर्ववृक्षाणाम् '

 अर्थात् ' मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूं | ' इस कथन में उन्होंने अपने आपको पीपल के वृक्ष के समान ही घोषित किया है |

पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान् विष्णु का रूप है | इसलिए विष्णु  इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली और इसका विधि वत् पूजन आरंभ हुआ | अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा का विधान है | सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात् भगवान् विशुन एवं लक्ष्मी का वास होता है |

पुराणों में पीपल (अश्वत्थ ) का बड़ा महत्व बताया गया है  -

मूल विष्णुः स्थितो  नित्यं स्कन्धे केशव एव च |

नारायणस्तु शाखासु पत्रेषु भगवान् हरिः ||

फ़लेश्च्युतो न सन्देहः सर्वदेवै  समन्वितः ||

स एव  विष्णुर्द्रम एव मूर्तो महात्मभिः सेवतिपुण्यमूलः |

यस्याश्रयः पापसहस्त्रहन्ता भवेन्नृणां कामदुधो गुणाढ्यः ||

अर्थात् ' पीपल की जड़ में विष्णु , तने में केशव , शाखाओं में नारायण , पत्तों में भगवान् हरि और फल में देवताओं से युक्त अच्युत सदा निवास करते हैं | यह वृक्ष मूर्तिमान श्रीविष्णुस्वरूप है | महात्मा पुरष इस वृक्ष के पुण्यमय मूल की सेवा करते हैं | इसका गुणों से युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्यों के हजारों पापों का नाश करने वाला है | '

पद्मपुराण के मातानुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है | जो व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है , वह सभी पापो से छुटकारा पाकर स्वर्ग को जाता है | पीपल में पितरो का वास माना गया है | इसमें सब तीर्थो का निवास होता है | इसलिए मुंडन आदि संस्कार पीपल के नीचे करवाने का प्रचलन है |

महिलाओं में यह विश्वास है कि पीपल की निरंतर पूजा अर्चना व परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से संतान की प्राप्ति होती है , पुत्र उत्पन्न होता है , पुण्य मिलता है , अदृश्य आत्माएं तृप्त होकर सहायक बन जाती हैं कामनापूर्ति के लिए पीपल के तने पर सूत लपेटने की भी परंपरा है | पीपल की जड़ में शनिवार को जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है | शनि की जब साढ़ेसाती दशा होती है , तो लोग पीपल के वृक्ष का पूजन और परिक्रमा करते हैं , क्योंकि भगवान् कृष्ण के अनुसार शनि की छाया इस पर रहती है | इसकी छाया यज्ञ , हवन , पूजापाठ , पुराणकथा आदि के लिए श्रेष्ठ मानी गई है |  पीपल के पतों से शुभकाम में वंदनवार भी बनाए जाते हैं | धार्मिक श्रद्धालु लोग इसे मंदिर परिसर में अवश्य लगाते हैं | सूर्योदय से पूर्व पीपल पर दरिद्रता का अधिकार होता है और सूर्योदय के बाद लक्ष्मी का अधिकार होता है | इसलिए सूर्योदय से पहले इसकी पूजा करना निषेध किया गया है | इसके वृक्ष को काटना या नष्ट करना  ब्रह्महत्या  के तुल्य पाप माना गया है | रात में इस वृक्ष के नीचे सोना अशुभ माना जाता है |

वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल रात दिन निरंतर 24 घंटे आक्सीजन देने वाला एकमात्र  अद्भुत  वृक्ष है | इसके निकट रहने से प्राणशक्ति बढ़ती है | इसकी छाया गर्मियों में ठंडी और सर्दियों में गर्म रहती है | इसके अलावा पीपल के पत्ते , फल आदि आदि में औषधीय गुण रहने के कारण ये रोगनाशक भी होता है |