21 Nov

मंदिर एक ऐसा स्थल होता है , जहां आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण  होता है तथा देवपूजा उसका लक्ष्य होता है । यहां आप अकेले या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में भी बैठकर शांतमन से जप, पूजा पाठ , आरती , भजन , मंत्रपाठ , ध्यान आदि कर सकते हैं । ऐसे धूप - दीप आदि सुगंधित द्रव्यों के कारण मंदिर के चरणों की ओर दिव्यशक्ति का संचार होता रहता है, जिसके कारण भूतप्रेत और विषाणुयुक्त कीटाणुओ की शक्ति नष्ट होती है । वातावरण में आपके मन की भाव दशा प्रभु की भक्ति, पूजा, प्रार्थना उपासना के अनुकूल होती है , जिससे इस कर्म कांडों को पूरा करने का आपको शारीरिक और मानसिक लाभ मिलता है और अभिष्टफल की प्राप्ति होती है ।

इसमें कोई दो मत नहीं कि मंदिर जाने वालों में वास्तविक भक्त कम और याचक यानी भगवान् से कुछ न कुछ मांगने वाले ज्यादा होते हैं । कुछ मन्नत मांगने के लिए मंदिर पहुंचते हैं तो कुछ मांगी हुई मन्नत पूरी होने पर अपना वायदा पूरा करने के लिए मंदिर पहुंचते हैं । मतलब यह कि भगवान् को भी मंदिर में रिश्वत का लालच देने का प्रचलन आम बन गया है । यदि हम कुछ मांगने के लिए ही मंदिर जाते हैं तो फिर हम मंदिर नहीं , किसी दुकान पर जाते हैं । जबकि वास्तविक, सच्चाभक्त भक्तिभाव, अहोभाव और प्रभु के प्रति श्रद्धा लेकर ही मंदिर जाता है ।

एक बार जदगुरु शंकराचार्य से नगरसेठ माणिक ने पूछा - '' आचार्यवर ! आप तो वेदांत के समर्थक हैं । भगवान् को निराकार सर्वव्यापी मानते हैं , फिर मंदिरों की प्रदर्शनात्मक मूर्तिपूजा परक प्रकिया का समर्थन क्यों करते हैं ?''

आचार्य बोले – “वत्स ! उस दिव्य सर्वव्यापी चेतना का बोध सबको अनायास नहीं होता । मंदिरो में प्रातः संध्या , शंख - घटों के नाद के साथ दूर - दूर तक उपासना के समय का बोध कराया जाता है । घर - घर उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते , मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी जाकर उपासना कर सकता है । ''

मंदिर के ऊपर बने गुबंद एक अर्थ में हमारे ऋषि मुनियों द्वारा  खोजे गए पिरामिड संबंधी ज्ञान के प्रतिरूप हैं । पिरामिड सिध्दांत के गुबंद के रूप में एक ऐसे शक्तिक्षेत्र का निर्माण किया जाता है , जहां रखी वस्तुएं बहुत काल तक पृथ्वी के बाह्य प्रभाव से मुक्त होकर सुरक्षित रहती हैं । मिस्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष से रखी मृत देह और अन्य वस्तुओ का आज भी सुरक्षित मिलना तथा एक विशेष प्रकार की चुबंकीय शक्ति का वहां मिलना इन्हीं तथ्यों को प्रकट करता है । इस रूप में मंदिर के गुबंद का देव प्रतिमाओं, साधकों और उनकी भावनाओं की सुरक्षा एवं इच्छा पूर्ति से स्पष्ट संबंध प्रतीत होता है ।