22 Sep

जानिए श्राद्ध पक्ष का महत्व !

श्राद्व का आरंभ भाद्रपद की पूर्णिमा और अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से होता है और अश्विन मास क़ी अमावस्या तक ' पितृपक्ष ' कहलाता है | इस पक्ष में मृत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है |

श्राद्ध करने का अधिकार ज्येष्ठ पुत्र अथवा नाती को होता है | पुरुष के श्राद्ध में ब्राह्मण को तथा औरत के श्राद्ध में ब्राह्मणी को भोजन कराते हैं | भोजन में खीर - पूरी होती है | भोजन के बाद दक्षिणा दी जाती है | पितृपक्ष में पितरों की मरने की तिथि को ही उनका श्राद्ध किया जाता हैं | गया में श्राद्ध करने का बड़ा महत्व माना गया है | पितृपक्ष में देवताओं को जल देने के पश्चात् मृतको का नामोच्चारण करके उन्हें भी जल देना चाहिए | बुजर्गों की मृत्यु तिथि के दिन श्रद्वापूर्वक तर्पण और ब्राह्मण को भोजन करना ही श्राद्ध है |

तर्पण : पान , सुपारी , काला तिल , जौ , गेहूं , चंदन , जनेऊ , तुलसी , पुष्प , दूब , कच्चा दूध , पानी आदि सामग्री पूजा हेतु एकत्रित कर लेनी चाहिये | पूजा का स्थान गाय के गोबर से साफ़ कर लेना चाहिये | मृत पितृ के निमित्त और उनका तिथि स्मरण करके नैवैध निकल देना चाहिये | एक थाली में गाय का (पंच ग्रास ) तथा एक थाली में ब्राह्मण भोजन निकाले |

श्राद्ध संकल्प : आज मिमि ....... वार......... मास ........ ( कृष्ण पक्ष / शुक्ल पक्षे ) पक्षे सयुंक्त पितृ / मातृ या दादा / दादी ) की पुण्य तिथि पर उनके ब्रहालोक में स्वर्ग का आनन्द एवं सुख की प्राप्ति हेतु धर्मराज की प्रसन्नता के लिये काक बलि , मार्ग देवता की प्रसन्नता के लिये खाना ( कुत्ता ) बलि , वैतरणी नदी के पार कराने हेतु गौग्रास बलि , कीट पतंग योनि की तृप्ति व अतिथि देवता हेतु पंच ग्रास बलि  .... ( अमुक ) के निमित्त है | उनकी ( माता - पिता , दादा - दादी ) भूख प्यास का दोष शान्त हो तथा उन्हें आनन्द की प्राप्ति होवे | हमारे वंश व धन की वृद्धि होवे |

( ऐसा बोलते हुये हाथ में जल , जौ , तिल दक्षिणा रखे हुए पांचों ग्रास पर घुमाकर की ओर मुंह करके छोड़ दें ) इसके अतिरिक्त ब्राह्मण भोजन के निमित्त जो थाली प्रसाद रखा है उस पर घुमाकर जल छोडे और कहे इससे हमारे। ........ ( माता - पिता , दादा - दादी ) की तृप्ति होवे प्रसन्नता होवे |