28 Nov

उल्लेखनीय है की हमारे मस्तिष्क ( ललाट ) से ही तिलक , टीका , बिंदिया का संबंध इसलिए जोड़ा गया है कि सारे शरीर का संचालन कार्य वही करता है । महर्षि याज्ञवल्क्य ने शिवनेत्र की जगह को ही पूजनीय माना है । पवित्र विचारो का उदय मस्तिष्क पर तिलक लगाने से होता है । ललाट के मध्य मानवशरीर का वह बिंदु है , जिससे निरंतर चेतन अथवा अचेतन दोनों अवस्थाओ में विचारों का झरना प्रवाहित होता रहता है । इसी को आज्ञाचक्र भी कहते हैं ।

प्रमस्तिष्क , मस्तिष्क का ऊपरी भाग है , जो मनुष्य को देवता अथवा , राक्षस , प्रकांड विद्धान अथवा मूर्ख बनान की शक्ति रखता है  हमारी दोनों भौवों के बीच सुषुम्ना , इड़ा और पिंगला नाड़ियों के ज्ञानंततुओं का केंद्र मस्तिष्क ही है , जो दिव्य नेत्र या तृतीय नेत्र के समान माना जाता है । इस पर तिलक लगाने से आज्ञाचक्र जाग्रत होकर व्यक्ति की शक्ति को उर्ध्वगामी बनाता है , जिससे उसका ओज और तेज बढ़ता है । शरीरशास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीयूष ग्रंथि ( पिनियल ग्लैंड ) का है , जहां अमृत का वास होता है । इसका स्त्राव सोमरस के तुल्य मना गया है । ललाट पर नियमित रूप से तिलक लगते रहने से शीतलता , तरावट एवं शांति का अनुभव होता है । मस्तिष्क के रसायनों सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन का स्त्राव संतुलित रहने से मनोभावो में सुधार आकर उदासी दूर होती है । सिर दर्द की पीड़ा नहीं सताती और मेघाशक्ति तेज होती है । मन निर्मल होकर हमें सत्पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है । विवेकशीलता बनी रहती है और आत्म विश्वास बनता है ।

आमतौर पर चंदन , कुंकुम , मृत्तिका व भस्म का तिलक लगाया जाता है । चंदन के तिलक लगाने से पापों का नाश होता है , व्यक्ति संकटों से बचता है , उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है , ज्ञान तंतु सयंमि व सक्रिय रहतें हैं मस्तिष्क को शीतलता और शांति मिलती है । कुंकम में हल्दी का संयोजन होने से त्वचा को शुद्ध रखने की सहायता मिलती है । और मस्तिष्क के स्नायुओं का संयोजन प्रकृतिक रूप से हो जाता है । संक्रामक कीटाणुओं को नष्ट करने से शुद्ध मृत्तिका का महत्वपूर्ण योगदान होता है । यज्ञ की भस्म का तिलक करने सौभग्य की वृद्धि होती है । ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिलक लगाने से ग्रहों की शांति होती है । तंत्रशास्त्र में वशीकरण आदि के लिए भी तिलक लगाया जाता है ।

धर्मशास्त्र के अनुसार ललाट पर तिलक या टीका धारण करना एक आवश्यक कार्य है,  क्योंकि यह हिंदू संस्कृति का एक अभिन्न अंग है । कोई भी धार्मिक आयोजन या संस्कार बिना तिलक के पूर्ण नहीं माना जाता । जन्म से लेकर मृत्युशया इसका तक प्रयोग किया जाता है । यों तो देवी देवताओं , योगियों , संतों महात्माओं के मस्तक पर हमेशा तिलक लगा मिलता है , लेकिन आमलोगों में धार्मिक आयोजनों , पूजा पाठ , संस्कारो के अवसरों पर तिलक लगाने का प्रचलन है ।

भारतीय परंपरा के अनुसार तिलक लगाना सम्मान का सूचक भी माना जाता है । अतिथियों को तिलक लगाकर विदा करते हैं , शुभयात्रा पर जाते समय शुभकामनाएं प्रकट करने के लिए तिलक लगाने की प्रथा प्रचीनकाल से आ रही है । ब्रह्रावैवर्त पुराण में कहा गया है –

स्नानं दानं तपो होमो देवतापितृकर्म च ।

तत्सर्व निष्फल यादि ललाटे तिलक विना ।

 ब्राह्राणस्तिकलं कृत्वा कुर्य्यात्सध्यन्तपर्णम् ॥

अर्थात् स्नान , होम , देव , और पितृकर्म करते समय यदि तिलक न लगा हो , तो यह सब कार्य निष्फल हो जाते हैं | ब्राह्राण को चाहिए कि वह तिलक धारण करने के बाद ही संध्या , तर्पण आदि संपन्न करे |