भइया दू

यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की  द्धितीय  को मनाया जाता है । इस दिन यमुना में स्नान करके यमुना तथा यमराज के पूजन का विशेष विधान है । भइया दूज को बहने अपने भाइयों को जिमाए , अपने हाथों से टिका लगाएं , नारियल दें । भाई अपनी बहनो को रुपये दें । यदि बहन भाई को अपने हाथ से जिमाये तो भाइयो की उम्र बढ़ती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं ।

भइया दूज की कहानी

किसी नगर में एक ब्राह्मण रहता था जिसकी दो संताने थीं । एक लड़का और एक लड़की । लड़की बड़ी सुशील थी । वह अपने भाई को कभी नाराज होकर बुरा भला नहीँ कहती थी । वह भाई अपनी बहन से मिलने उसकी सुसराल गया तो वह चर्खा कात रही थी । तभी बहन का सूत का तार टूट गया व भाई आने का पता नहीँ लगा । वह तार बार बार जोड़ रही थी पर वह जुड़ा नहीँ और पीछे मुड़कर देखा तो भाई खड़ा था ।

वह भाई से गले मिलकर अपने भाई के आदर सत्कार के लिए पड़ोसन से पूछने गई । उसने तेल का चौका लगाकर घी में चावल पकाए परन्तु चौका सुखा नहीँ और चावल पके नहीँ । दूसरी सहेली से पूछने पर गोबर का चौका लगाकर दूध तथा पानी में चावल डालकर खीर बनाई और भाई को खिलाई । दूसरे दिन भाई के रास्ते के लिए वह चक्की में आटा पीसने लगी । आटे के साथ चक्की में सांप पीस गया और उसे पता नहीँ चला । उसने उस आटे के लड्डू बना दिये और कपडे में बांधकर दे दिये । जब वह चला गया तो उसे सांप पीसने का पता चला ।

भाई की प्यारी बहन अपने बच्चो को पालने में ही सोता छोड़कर भाई की राह पर चल दी । बहुत दूर जाने पर उसका भाई एक पेड़ की छाया में सोता हुआ मिला और पास में पोटली रखी देखी । भाई ने अब तक कुछ नहीँ  खाया था । उसने सारे लड्डू फेंक दिये और भाई के साथ पीहर चली गई । रास्ते में उसने भारी - भारी शिलाएं उतरी देखीं । एक राहगीर से जब उसने उन शिलाओं के बारे में पूछा तो उसने बताया कि जो बहन अपने भाई से कभी नाराज न होती हो उसके भाई की शादी के समय ये उसके छाती पर रखी जाएगी । थोड़ी दूर जाने पर उसे नाग  तथा नागिन मिले । नाग बोला - जिसकी छाती पर ये शिलाएं रखी जाएंगी उसे हम खा लेंगे । उपाय पूछने पर नागिन ने बताया कि भाई के सब काम बहन करे तथा भाई भावज को कोसकर गालियां दे तभी वह भाई बच सकेगा ।

वहीँ से वह भाई को कोसने लगी । गालियां देती देती पीहर पहुंच गई । मां बाप को बेटी का यह व्हवहार अच्छा नही लगा । विवाह की लगन आई तो वह भाई को गाली देती हुई स्वयं लगन चढ़ाने लगी और वह घोड़ी पर बैठ गई । ज्योही वह घोड़ी पर बैठी तभी शिलाएं उड़ती हुई आई और पुरुष के स्थान पर नारी को देखकर वापिस चली गई । ऐसा देखकर बारात के लोग उसे अपने साथ  ले गये । फेरो का समय आया तो उसने भाई को पीछे धकेल दिया और गन्दी गन्दी गालिया देकर  फेरे ले लिए वह सब काम स्वयं कर रही थी । समय आने पर नाग नागिन उसके भाई को काटने आए । वह तो  जानती थी ।

नाग नागिन को मारने की तैयारी पहले ही कर रखी थी । आते ही दोनों को मारकर जेब में रखकर तीन दिन सोई रही । सारे मेहमान विदा हो गए तब उसकी मां को उसकी याद आई कि उसे भी विदा करे । विदा के समय उसने मां की उपेक्षा कर गुस्से से बोली कि मैं इतनी नीच नहीँ हूं । उसने मरे हुए सांपो को दिखाकर बताया कि नाग नागिन भाई भाभी को डसने आए थे । मैंने अपनी जान पर खेलकर भाई के जीवन की रक्षा की है ।

इसी भाई के पीछे मैं अपने बच्चे का पालने में रोते चिल्लाते छोड़कर आई हूं । मेरे भाई भाभी को किसी प्रकार का कष्ट न हो । यह कहकर लौटने लगी तो मां और भाई ने उसे रोका और आदर के साथ विदा किया । भैया दूज के दिन चित्रगुप्त की पूजा के साथ - साथ दवात तथा पुस्तकों की भी पूजा की जाती है ।