धन तेरस का महत्व 

धन तेरस की प्राचीनता का प्रमाण वैदिक साहित्य में भी पाया जाता है । चूंकि यमराज वैदिक देवता माने जाते हैं , इसलिए इस दिन यमराज की भी पूजा की जाती है । धनतेरस के दिन लक्ष्मी का आवास होता है । कार्तिक लगते ही तेरस को धन तेरस कहते हैं । धन तेरस के दिन एक मिट्टी का दीपक बना लें । बाद में रात को जीमने के बाद सिर्फ औरतें दीपक का पूजन करें और दीपक में तेल डाल कर उसमें चार बत्ती  लगाकर एक कोड़ी में छेद कर दीपक जला दें । जल का छीटा दें , रोली , चावल , चार सुहाली , थोड़ा सा गुड़ , फूल दक्षिणा , धूप रख दें । चार फेरी देकर बाद में दीपक उठाकर अपने घर के आगे रख दें  । सुबह दीपक में से कोड़ी निकालकर रख दें । यदि धन तेरस के दिन आपके घर में पुराना बर्तन हो तो उसको देकर नया बर्तन ले आये । हो सके तो चांदी का बर्तन भी मंगवाना चाहिए ।

धन तेरस की कथा 

एक दिन भगवान विष्णु मृत्यु लोक में विचरण करने के लिए लक्ष्मी सहित भूमण्डल पर आये । कुछ देर बाद लक्ष्मी जी से बोले - मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं तुम उधर मत देखना । यह कह ज्यो ही भगवान ने राह पकड़ी त्योंही लक्ष्मी जी पीछे पीछे चल पड़ी । कुछ ही दूर पर सरसों का खेत दिखाई दिया । उसके बाद ऊख तोड़कर चूसने लगी । तत्क्षण भगवान लौट आये और यह देखकर लक्ष्मी जी पर क्रोधित होकर शाप दिया की जिस किसान का यह खेत है 12 वर्ष तक उसकी सेवा करो । ऐसा कहकर भगवान  क्षीरसागर  चले गये । और लक्ष्मी ने किसान के यहां जाकर धन - धन्य से पूर्ण कर दिया । तत्पश्चात् 12 वर्ष बाद लक्ष्मी जी जाने के लिए तैयार हुई किन्तु किसान ने रोक लिया । भगवान जब किसान के यहां लक्ष्मी को बुलाने आये तो किसान ने लक्ष्मी को नही जाने  दिया । तब भगवान बोले - तुम परिवार सहित गंगा जाकर स्नान करो और इन कौडियो को भी जल में छोड़ देना । जब तक नही लौटोगे  तब तक मै नही जाऊंगी ।
किसान  ने ऐसा ही किया । जैसे ही उसने गंगा में कौढियां डाली वैसे ही गंगा में से चार चतुर्भुज निकले और कौढियां लेकर चलने को उद्दत हुए । जब किसान ने ऐसा आश्चर्य देखा तो गंगा जी से पूछा कि - ये चार भुजाएं किसकी थी , गंगा जी ने बताया कि - हे किसान् वे चारों हाथ मेरे ही थे , तूने जो कौढियां मुझे भेंट की हैं , वे किसकी दी हुई हैं ? किसान बोला - मेरे घर में दो सज्जन आए हैं , उन्होंने ही दी हैं ।
गंगाजी बोले - तुम्हारे घर पर जो स्त्री वह लक्ष्मी है और पुरुष विष्णु भगवान हैं । तुम लक्ष्मी को जाने देना , नही तो पुनः उसी भांति निर्धन हो जाओगे । यह सुन जब वह घर लौटा तो भगवान से बोला कि में लक्ष्मीजी को नहीँ जाने दूंगा । तब भगवान ने समझाया कि इनको मेरा श्राप था जो कि बारह वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही हैं । फिर लक्ष्मी चंचल हैं । इनको बड़े बड़े रोक नही सके । किसान ने हठपूर्वक पुनः कहा - नही , मैं लक्ष्मी जी को नही जाने दूंगा । इस पर लक्ष्मी जी ने स्वयं कहा कि हे किसान ! यदि तुम मुझे रोकना चाहते हो तो सुनो । कल धन तेरस है , तुम अपना घर स्वछ रखो । रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना , तब मैं तुम्हारे घर आउंगी । उस समय मेरी पूजा करना किन्तु मैं तुम्हे दिखाई नही दूंगी । किसान ने कहा ठीक है , मैं ऐसा ही करूंगा । इतना कह और सुन लेने के बाद लक्ष्मी जी दशों दिशाओ में फैल गईं  , भगवान देखते ही रह गये । दूसरे दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया । उसका घर धन -धान्य से पूर्ण हो गया । इसी भांति वह हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा करने लगा । उस किसान को ऐसा करते देखकर कितने ही लोगो ने पूजा करना शरू कर दिया ।