दशहरा पूजन की विधि 

चिंतामणि ग्रंथ में कहा गया है कि आश्विन शुक्ल दशमी के दिन तारों के उदय होने का जो समय है , उसका विजय से सबंध है । जो सारे काम और अर्थों को पूरा करने वाला है । जो आदर के साथ दशमी का व्रत करता है वह सफलता पाता है । दशहरे के ऊपर जल , रोली , चावल , मौली , गुड़ , दक्षिणा , फूल और जौ चढ़ाना चाहिए । एक घड़ी में  एक नगद रूपया रखें , दूसरे में फल , रोली , चावल से पूजा करें । थोड़ी देर बाद जिस हांड़ी में रूपया रखा हो उस रुपये को निकालकर अलमारी में रख दें । बहीखाते में सतिया लगाकर उस पर जल , फूल, रोली , चावल , चढ़ाये । बहीखता पूजकर दवात - कलम का पूजन करें ।  

नीलकंठ का दर्शन करें । भोजन में हलवा , पूरी बनायें । और ब्राह्मण जिमाएँ और दशहरे के दिन श्रीरामचंन्द्र जी की व रामायण की पूजा करें , भोग लगायें ।      

दशहरे की कहानी      

एक अवसर पर शिवजी से पार्वती जी ने दशहरे के त्यौहार के प्रचलन व इसके फल के बारे में जानना चाहा , तो शिवजी ने कहा - '' आश्विन शुक्ल दशमी को नक्षत्रों के उदय होने से विजय नामक काल बनता है , जो सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है ।शत्रु पर विजय प्राप्त करने की इच्छा करने वाले राजा को भी इसी समय प्रस्थान करना चाहिए । मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचन्द्र जी ने इसी विजय काल में लंका पर चढाई की थी । इसलिये यह दिन बहुत पवित्र माना जाता है । और क्षत्रिय लोग इसे अपना प्रमुख त्योहार मानते हैं । शत्रु से युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं को अपनी सीमा का उल्लंघन अवश्य करना चाहिए । अपने तमाम दल और बल को सुसज्जित करके पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष की पूजा करनी चाहिए ।

पूजन करने वाला शमी के सामने खड़ा होकर इस प्रकार ध्यान करे - हे शमी ! तू सब पापो को नष्ट करने वाला है और शत्रुओं को भी परास्त करने वाला है । तूने अर्जुन का धनुष धारण किया और रामचन्द्र जी से प्रिय वाणी कही । पार्वती जी बोलीं - '' शमी  वृक्ष ने अर्जुन का धनुष कब और किस कारण धारण किया था तथा रामचन्द्र जी से कब और कैसी प्रियवाणी कही थी , कृपा कर समझाइये । '' शिवजी ने उत्तर दिया - ''दुर्योधन ने पांडवो को जुएँ में हराकर इस शर्त पर बनवास दिया कि वे बारह वर्ष तक प्रकट रूप से वन में जहां चाहे फिरे किन्तु एक वर्ष बिल्कुल अज्ञातवास में रहें । यदि इस वर्ष में उन्हें कोई पहचान लेगा तो उन्हें बारह वर्ष और भी वनवास भोगना पड़ेगा । उस अज्ञातवास के समय अपना धनुष - बाण एक शमी वर्ष पर रखकर राजा विराट के यहाँ वृहन्नलता के वेष में रहे थे । विराट के पुत्र कुमार ने गौओं की रक्षा के लिये अर्जुन ने शमी के वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओ पर विजय प्राप्त की थी । शमी वृक्ष ने अर्जुन के हथियारों की रक्षा की थी । और विजय दशमी के दिन रामचन्द्र जी ने लंका पर चढ़ाई करने के लिये प्रस्थान करने के समय शमी वृक्ष ने कहा था की आपकी विजय होगी । इसलिये विजय काल में शमी वृक्ष की भी पूजा की जाती है । '' एक बार युधिष्ठिर के पूछने पर श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि - हे राजन् ! विजय दशमी के दिन राजा को स्वयं अलंकृत होकर अपने दासों और हाथी , घोड़ो का श्रृंगार करना चाहिए तथा गाजे - बाजे के साथ मंगलाचार करना चाहिए ।

उसे उस दिन अपने परोहित को साथ लेकर पूर्व दिशा की ओर जाकर अपनी सीमा से बाहर निकल जाना चाहिए और वहां वास्तु - पूजा करके अष्ट - दिग्पालों तथा पार्थ देवता की वैदिक मंत्रो से पूजा करनी चाहिए । शत्रु की मूर्ति अथवा पुतला बनाकर उसकी छाती में बाण लगाए और परोहित वेद मंत्रो का उच्चारण करें । ब्राह्मणों की पूजा आदि करके हाथी , घोड़ा , अस्त्र - शस्त्र आदि का निरीक्षण करना चाहिए यह सब क्रिया सीमांत में अपने महल में लौट कर आ जाना चाहिए । जो राजा विधिपूर्वक पूजा आदि करता है वह सदा ही अपने शत्रु की सीमा पर विजय प्राप्त करता है ।