गोवधर्न पूजा ( अन्नकूट )

इस दिन प्रात काल शरीर पर तेल की मालिश करके स्नान करना चाहिए । दिवाली के दूसरे दिन सुबह अन्नकूट की रसोई बनाए और सब तरह की रसोई मिठाई का भगवान को भोग लगायें , ब्राह्मण को जिमाये और अन्नकूट का प्रसाद सबको बांटकर खुद भी लें । सुबहा नहा धोकर पहले गोवर्धन की पूजा करे । गोवर्धन गोबर से बनांए । गोवर्धन पर जल , मौली , रोली चावल , फूल , दही , तेल में भिगोकर रुई तेल का दीया जलाएं । मूंग की दाल , चीनी ,  चार गुड़ की सुहाली , दक्षिणा , सफ़ेद कपडा चढाए और गोवर्धन के सिर पर झरना रख दें । गोवेर्धन गीत गाएं , चार बधावे गाएं । पूजा का चढ़ावा मिसरानी को दें ।

गोवर्धन ( अन्नकूट ) की कथा

एक दिन भगवान कृष्ण ने देखा कि पूरे ब्रज में तरह - तरह के मिष्ठान तथा पकवान बनाये जा रहे हैं । पूछने पर ज्ञात हुआ  कि यह सब वक्रासुर संहारक , मेघदेवता देवराज इन्द्र की पूजा के लिए तैयार हो रहा है । इन्द्र की प्रसन्नता से ही वर्षा होगी । गायों को चारा मिलेगा तथा जीविकोपार्जन की समस्या हल होगी । यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की निदां करते हुए कहा कि उस देवता की पूजा करनी चाहिए जो प्रत्यक्ष आकर पूजन साम्रगी स्वीकार करे । गोपो ने यह सुनकर कहा कि कोटि - कोटि देवताओ  के राजा की इस तरह आपको निंदा नहीँ करनी चाहिए । कृष्ण ने कहा इन्द्र में क्या शक्ति है जो पानी बरसाकर हमारी सहायता करेगा । उससे तो शक्तिशाली तथा सुन्दर यह गोवर्धन पर्वत है , जो वर्ष का मूल कारण है , इसकी हमें पूजा करनी चाहिए । भगवान श्रीकृष्ण के वाग्जाल में फंसकर सभी ब्रजवासियो ने चारों ओर धूम मचा दी । तत्पश्चात् नन्दजी ने ग्वाल गोपांगनाओं सहित एक सभा में कृष्ण से पूछा कि इन्द्र की पूजा से दुर्भिक्षी उत्पीड़न समाप्त होगा । चौमासे के सुन्दर दिन आयेंगे मगर गोवर्धन पूजा से क्या लाभ होगा ? उतर में श्रीकृष्ण जी ने गोवर्धन की भूरि भूरि प्रशंसा की तथा उसे गोप गोपियों की आजीविका का एकमात्र सहारा सिद्ध किया । भगवान की बात सुनकर समस्त ब्रजमंडल बहुत प्रभवित हुआ तथा अपने - अपने घर से लाकर सुमधुर मिष्ठान पकवानों सहित पर्वत तराई में कृष्ण द्धारा बताई विधि से गोवर्धन की पूजा की । भगवान की कृपा से ब्रजवासियों द्धारा अर्पित समस्त पूजन साम्रगी को गिरिराज ने स्वीकार करते हुए आशीर्वाद दिया । सभी जन अपना पूजन सफल समझकर प्रसन्न हो रहे थे , तभी नारद इन्द्र महोत्सव देखने की इच्छा ब्रज आ गए । पूछने पर ब्रज नागरिको ने बताया कि श्रीकृष्ण की आज्ञा से इस वर्ष इन्द्र मोहत्सव समाप्त कर दिया गया है । यह सुनते ही नारद उल्टे पांव इन्द्रलोक गये तथा खिन्न मुखमुद्रा में बोले - देवराज ! तुम महलों में सुख की नीँद की खुमारी ले रहे हो उधर ब्रजमंडल में तुम्हारी पूजा समाप्त करके गोवर्धन की पूजा हो रही है । इसमें इन्द्र ने अपनी मानहानि समझकर मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर प्रलयकालिक मूसलधार वर्षा से पूरा गांव तहस नहस कर दें । पर्वताकार प्रलयकारी बादल ब्रज की ओर उमड़ पड़े । अचानक वर्षा देखकर ब्रज घबरा गया । सभी ब्रजवासी श्रीकृष्ण की शरण में जाकर बोले - भगवान् ! इन्द्र हमारी नगरी को डुबोना चाहता है , अब क्या किया जाए ?  

श्री कृष्ण ने सांत्वना देते हुए कहा - तुम लोग गउओ सहित गोवर्धन की शरण में चलो । वही तुम्हारी रक्षा करेगा ।  इस तरह से ग्वाल बाल गोवर्धन की तराई में पहुंच गये । श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया और सात दिन तक गोप गोपीकाएं उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे । भगवान की कृपा से उनको एक छीटा भी न लगा । इससे इन्द्र को महान आश्चर्य हुआ । तब भगवान की महिमा को समझकर अपना गर्व जानकर वह स्वयं ब्रज में गया और भगवान कृष्ण के चरणों में गिरकर अपनी मूर्खता पर महान् पश्चाताप किया । सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखकर इसी भांति प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी । तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा