महाशिवरात्रि

यह भगवान् शिव का अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है । फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि का व्रत आता है । इस दिन शिवजी और पार्वतीजी की पूजा करें । रोली , मौली , चावल , पान , सुपारी लौंग , इलायची , चन्दन , दूध , दही , घी , चीनी , शहद , फल - फूल , कमलगट्टा, धूतरा , बेलपत्र , प्रसाद , दक्षिणा चढ़ाकर धूप दीपक जलाकर रात को जागरण करें । तब ब्राह्मण से पूजा पाठ करवायें । चार बार आरती करें । शिवजी का भोग लगाकर सबको प्रसाद बांटें ।

महाशिवरात्रि की कथा

प्राचीन समय में एक नृशंस बहेलिया था जो नित्य प्रति अनगिनत निरपराध जीवों को मारकर अपने परिवार का पालन पोषण करता था । एक बार पूरे जंगल में विचरण करने पर भी जब उसे कोई शिकार न मिला तो क्षुध व्याकुल एक तलाब के किनारे बैठ गया । उसी स्थान पर एक बेल के वृक्ष के निचे शिवलिंग स्थापित था । बहेलिया ने उसी वृक्ष की शाखा पर चढ़कर अपनी आवास स्थली बनाने  के  लिए , बेलपत्रों लो तोड़ते हुए शिवलिंग को ढक दिया । दिन भर  की भूख से व्याकुल उस बहेलिया का एक प्रकार से शिवरात्रि का व्रत पूरा हो गया । कुछ रात बीत जाने पर गर्भवती हिरणी उधर कुलाचें भरती आई । व्याघ उसे मारने को तैयार हो गया । झिझकती , भयाकुल हिरणी दीन वाणी में बोलीं - हे व्याघ ! मैं अभी गर्भवती हूं , प्रसव बेला भी समीप है , इसलिए इस समय मुझे मत मारो , मैं प्रजनन क्रिया के बाद शीघ्र ही आ जाऊंगी । बहेलिया उसकी बातों में आ गया । थोड़ी रात व्यतीत होने पर एक दूसरी मृगी उस स्थान पर आई ।

 

बहेलिये के निशाने साधते ही उस मृगी ने भी निवेदन किया कि मैं अभी ऋतुक्रिया से निवृत सकामा हूं । इसलिए मुझे पति समागम करने दीजिए , मारिए नहीँ । मैं मिलने के पश्चात स्वयं तुम्हारे पास आ जाउंगी । बहेलिया ने उसकी बात को स्वीकार कर लिया । रात्रि की तृतीय बेला में एक तीसरी हिरणी छोटे छोटे छौनों को लिए उसी जलाशय में पानी पीने आई । बहेलिया ने उसको भी देखकर धनुष बाण उठा लिया । तब वह हिरणी कातर स्वर में बोली - हे व्याघ ! में इन छौनों  को हिरण के सरक्षंण में कर आऊँ तो तुम मुझे मार डालना । बहेलिया ने दीन वचनों से प्रभावित होकर इसे भी छोड़ दिया । प्रातःकाल के समय एक मांसल बलवान हिरण उसी सरोवर पर आया । बहेलिया ने पुनः अपने स्वभावनुसार शर संधान करना चाहा । यह क्रिया देखते ही हिरण व्याघ से प्रार्थना करने लगा - हे व्यधराज ! मुझसे पूर्व आने वाली तीन हिरणियों को तुमने मारा है तो मुझे भी मारिये अन्यथा अगर वे तुम्हारे द्धारा छोड़ दी गई हों तो मुझे मिलकर आने पर मारना । मैं ही उनका सहचर हूं ।

हिरण की करुणामयी वाणी सुनकर बहेलिया ने रात भर की बीती बात कह सुनाई तथा उसे भी छोड़ दिया । दिन भर उपवास , पूरी रात जागरण तथा शिव प्रतिमा पर बेलपत्र गिरने (चढ़ाने ) के कारण बहेलिया में आन्तरिक शुचिता आ गई । उसका मन निर्दयता से कोमलता में ऐसा बदल गया की हिरण परिवार को लौटने पर भी न मारने का निश्चय कर लिया । भगवान शंकर के प्रभाव से उनका ह्रदय इतना पवित्र तथा सरल हो गया कि वह पूर्ण अहिंसावादी बन गया । उधर हिरणियों से मिलने के पश्चात हिरण ने बहेलिया के पास आकर अपनी सत्यवादिता का परिचय दिया । उनके सत्यग्रह से प्रभावित होकर ' अहिंसा परमोधर्मः ' का पुजारी हो गया । उसकी आंखों से आंसू छलक आये तथा पूर्वकृत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा । इस पर स्वर्गलोक से देवताओं ने व्याघ की सराहना की तथा भगवान शंकर ने दो पुष्प विमान भेजकर बहेलिया तथा मृग परिवार को शिवलोक का अधिकारी बनाया ।