ऋषि पंचमी

भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी मनायी जाती है | इस दिन ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए और गंगाजी में स्नान करना चाहिए | यदि गंगा जी में स्नान नहीं  कर सकते , तो घर में ही नहा लें | पहले सुबह  108  बार मिट्टी से हाथ धोएँ , गोपी चन्दन , तिल , आँवला , गंगाजल , गऊ का पेशाब इतनी चीजे मिलाकर हाथ और पैर धोएँ | 108 तरह की दातुन करें | 108   बार कुल्ला करें , 108   पत्ते सिर पर रखकर  108 बार घण्टी से नहाएँ | नहाकर नए कपड़े पहनें | बाद में गणेश जी की पूजा अर्चना करें | पूजा की सामग्री पंडित से पूछकर मंगवा लें | उसके बाद कथा सुनकर पूजा करने के बाद केला , घी , चीनी व दक्षिणा रखकर बयाना निकालकर हाथ फेरकर किसी भी ब्राहमण या ब्राह्मणी बायना  दें | दिन में एक बार ही भोजन करें | भोजन में दूध , दही , चीनी व अनाज कुछ भी सेवन करें | हल से जोती हुई चीजें  भी नहीं खानी चाहिए | भोजन में केवल फल और मेवा ही ग्रहण करें |

 

ऋषि पंचमी व्रत कथा

राजा सिताश्व ने ब्रह्मजी से पूछा कि सभी पापों को नष्ट करने वाला कौन सा श्रेष्ठ व्रत है ? तब ब्रह्मजी  ने ऋषि पचंमी को उत्तम बतलाया और कहा - '' हे राजन्  सिताश्व ! विदर्भ देश में एक उतंक नाम सदाचारी ब्राह्मण रहता था | उसकी पत्नी का नाम सुशीला था | उसके दो सन्तानेँ थीं - एक पुत्री तथा दूसरा पुत्र | कन्या विवाह होने के पश्चात् विधवा हो गई | इस दुःख से दुःखित ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित ऋषि पंचमी व्रत रखने लगे जिसके प्रभाव से जन्मों के आवागमन से छुटकारा पाकर स्वर्गलोक के वासी हो गये |